न खुद प्यार करता है न दूसरे को प्यार करने देता है
फिल्म देखकर निकला था वो। अंग्रेजी पिक्चर! किस-विस वाले बहुत से सीन थे उसमें। उत्तेजित हो कर निकला था। दूर से देखा एक घर के दरवाजे पर एक खूबसूरत महिला खड़ी है। जब उस घर के पास पहुँचा तो महिला घर के भीतर जाने लगी। वह भी उसके पीछे घर में घुस गया। महिला के कमरे तक जा पहुँचा और उत्तेजना के वशीभूत उसे किस करने लगा।
महिला ऐतराज करते हुये कहे जा रही थी, "छोड़ो छोड़ो, जान न पहचान प्यार करते हो।"
आवाज सुन कर महिला का पति वहाँ आ पहुँचा। उसकी हरकत देख कर महिला के पति ने आव देखा न ताव, झपट कर उसे गिरा दिया और उसकी छाती पर सवार हो कर उसे मारने लगा।
महिला जोर जोर से कहने लगी, "और मारो, और मारो, जान न पहचान प्यार करता है। और मारो, और मारो, जान न पहचान प्यार करता है।"
वह भी कमजोर नहीं था। थोड़ी देर तक मार खाते रहा फिर जोर लगा कर महिला के पति को नीचे गिरा दिया और छाती पर सवार होकर खाये हुये मार का बदला निकालने लगा।
महिला फिर जोर जोर से चिल्लाने लगी, "और मारो, और मारो, न खुद प्यार करता है न दूसरे को प्यार करने देता है।"
यह चुटकुला जिसे रेडियो सीलोन के एक लतीफे वाले कार्यक्रम में अभिनेत्री तबस्सुम ने सुनाया था। चुटकुलों की बात चली है तो अपनी पसंद के कुछ और चुटकुले पेश कर रहा हूँ।
एक आदमी मर गया। यमदूत लेने के लिये नहीं आये। बेचारी उसकी आत्मा भटक रही थी। भटकते भटकते आत्मा एक ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ पर दो बड़े बड़े दरवाजे थे। एक पर लिखा था स्वर्ग और दूसरे पर नर्क। उसने स्वर्ग वाला दरवाजा खटखटाया।
द्वारपाल ने दरवाजा खोल कर पूछा, "क्या चाहते हो?"
आत्मा ने कहा, "भीतर आना है।"
द्वारपाल ने फिर पूछा, "शादी की थी तुमने?"
"हाँ की थी।"
"तो भीतर आ जाओ भाई, नर्क तो तुम पहले ही भोग चुके हो।" कहकर द्वारपाल ने उसे भीतर जाने दिया।
पीछे एक और आत्मा खड़ी थी और पूरी वार्तालाप सुन रही थी। पहली आत्मा के भीतर जाने पर दूसरी आत्मा ने द्वारपाल से कहा, "मैंने दो शादी की थी।"
"बाजू के दरवाजे में जाओ, बेवकूफों के लिये यहाँ कोई जगह नहीं है।" कहकर द्वारपाल ने दरवाजा बंद कर दिया।
वो क्लास टीचर थे, ऊपर से ब्राह्मण! "ब्राह्मन को धन केवल भिच्छा" वाले सिद्धांत के अनुसार हमेशा वे अपनी जरूरत की चीजें जैसे कि चाँवल, आटा, साबुन, तेल आदि कक्षा के विद्यार्थियों के घर से मंगवा लिया करते थे। पर उनकी कक्षा में हरीश एक ऐसा विद्यार्थी था जिसने कभी भी मास्साब के लिये कुछ नहीं लाया। डाँट-मार खाने पर यही कहता था, "मम्मी देती ही नहीं तो क्या करूँ।"
मास्साब ने हरीश से कुछ मंगाना ही छोड़ दिया। पूरा साल बीत चला। अंत में एक दिन हरीश कक्षा में एक हांडी ले कर आया और हांडी को मास्साब को देते हुये बोला, "सर, मम्मी ने आपके लिये भिजवाया है।"
भूख जगा देने वाली वाली जोरदार सुगंध उठ रही थी हांडी से। मास्साब ने ढक्कन खोल कर देखा, पिश्ता, काजू आदि से भरपूर खीर थी। रोक नहीं सके अपने आपको वे। झट से निकाल कर थोड़ी सी खीर खाई और बोले, "वाह वाह! बहुत अच्छी बनी है।"
फिर अनायास पूछ बैठे, "अबे हरीश, तेरी मम्मी तो मेरे लिये कभी कुछ देती ही नहीं थी, आज कैसे उसने ये खीर भिजवा दिया?"
"वो क्या है सर, घर में मेहमान आये थे और उनके लिये मम्मी ने ये खीर बनाया था। खीर बन जाने पर एक कुत्ते ने उस पर मुँह मार दिया। मम्मी इसे फेंकने वाली थी खीर को तो मैने कहा मम्मी मत फेंको खीर को, मैने सर को आज तक कुछ भी नहीं दिया है, मैं उन्हें दे आता हूँ और मम्मी मान गईं।"
सुन कर मास्साब को बहुत गुस्सा आया। पटक कर हांडी फोड़ दी, खीर बिखर गया।
यह देख कर हरीश रोने लगा।
"अबे, धर्म तो मेरा भ्रष्ट हो गया। अब तू काहे को रो रहा है?" क्रोधित स्वर में मास्साब ने हरीश को फटकारा।
"आपने हांडी फोड़ दिया सर, अब हमारा पप्पू छिच्छी किसमें करेगा? हांडी वापस नहीं लाने पर मम्मी मुझे खूब मारेंगी।" सिसकते हुये हरीश ने जवाब दिया।
नाई की दुकान में एक आदमी एक बच्चे को लेकर पहुँचा और नाई से अपनी और बच्चे की कटिंग करने के लिये कहा। नाई बच्चे की कटिंग करने के लिये कुर्सी पर पाटा लगा रहा था तो आदमी ने कहा, "देखो भाई, मुझे बाजार में कुछ जरूरी काम है। तुम पहले मेरी कटिंग बना दो ताकि जब तक तुम बच्चे की कटिंग करोगे मैं अपना काम निबटा लूंगा।"
नाई ने वैसा ही किया। कटिंग बन जाने पर आदमी बाजार के लिये निकल गया और नाई ने बच्चे की कटिंग करना शुरू किया।
बच्चे की कटिंग बन जाने पर भी आदमी वापस नहीं आया तो नाई ने बच्चे से पूछा, "बेटे, पापा किधर गये हैं?"
"वो मेरे पापा नहीं हैं।" बच्चे ने बताया।
"तो चाचा होंगे।"
"वो मेरे चाचा भी नहीं हैं।"
"तो कौन हैं?"
"उन अंकल को तो मैं जानता ही नहीं। मैं खेल रहा था तो वे आकर बोले कि बेटे फ्री का कटिंग करवाओगे? और मेरे हाँ कहने पर मुझे अपने साथ यहाँ ले आये।" बच्चे ने उत्तर दिया।
"रमेश तुझे याद है तीन चार साल पहले हम दोनों कश्मीर गये थे?" दीपक ने पूछा।
"बिल्कुल याद है यार।"
"और वहाँ किसी होटल में जगह नहीं मिलने के कारण हम लोग एक धनवान विधवा के गेस्ट हाउस में ठहरे थे।"
"हाँ भइ"
"उस विधवा ने इसी शर्त पर ठहरने दिया था कि गेस्ट हाउस से लगे उसके कमरे में हम दोनों में से कोई भी नहीं जायेगा।"
"ये भी सही बात है यार।"
"पर तू उसके कमरे में गया था।"
"बिल्कुल नहीं गया था।"
"झूठ मत बोल, तू गया था। और नाम पता पूछने पर तूने उसे अपनी जगह मेरा नाम और पता बता दिया था।"
"चल मान लेता हूँ कि तू सही कह रहा है। पर इतने साल बीत जाने पर तू आज ये सब क्यों पूछ रहा है?" सिर खुजाते हुये रमेश ने पूछा।
"उस धनवान विधवा के वकील की चिट्ठी आई है मेरे पास।" दीपक ने जवाब दिया।
अब रमेश ने कुछ भयमिश्रित स्वर में पूछा, "क्या लिखा है चिट्ठी में?"
"यही कि वो स्साली धनवान विधवा मर गई है और वसीयत में अपनी सारी जायजाद मेरे नाम कर गई है।" दीपक ने बताया।
आप लोगों को यदि पसंद आया तो बाकी चुटकुले फिर कभी।

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